केन्द्रीय बिन्दुः मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव

सांप्रदायिकता के जवाब में कांग्रेस को जातीय गोलबंदी का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए

October 12, 2023 10:35 am | Updated 10:35 am IST

भौगोलिक रूप से देश के केंद्र में स्थित मध्य प्रदेश में, नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला होने की उम्मीद है। राज्य में अभी सत्ता में भाजपा है, अलबत्ता पांच साल पहले 2018 में चुनाव कांग्रेस ने जीता था। कांग्रेस से दल-बदल का इस्तेमाल कर, दो साल बाद, 2020 में भाजपा ने सत्ता हथिया ली थी। भाजपा को उम्मीद है कि वह कुछ चतुराई भरे कदमों और चुनावी प्रयोगों के जरिये 18 साल की सत्ता-विरोधी लहर से पार पा लेगी। पार्टी ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिये हैं कि अगर उसे एक और कार्यकाल मिलता है, तो मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पद पर बने नहीं रहेंगे। उसने तीन केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर, फग्गन सिंह कुलस्ते और प्रह्लाद पटेल समेत सात सांसदों को चुनाव मैदान में उतारा है। पार्टी को भरोसा है कि यह कदम उसके थके हुए कार्यकर्ताओं में नया जोश पैदा कर सकेगा। भाजपा की रणनीति यह भी है कि राज्य सरकार और मुख्यमंत्री चौहान के काम पर जोर न दिया जाए और पूरा फोकस प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्तिगत छवि पर रहे। पार्टी का प्रचार अभियान आदिवासियों जैसे सामाजिक समूहों पर केंद्रित है, लेकिन इसके साथ ही वह हिंदू अस्मिता की राजनीति का इकलौता पैरोकार होने की दावेदारी भी करती है। हाल ही में आदि शंकराचार्य की विशाल प्रतिमा के उद्घाटन जैसे कामों से यह साफ दिखायी देता है।

वर्ष 2020 की टूट के जख्म अभी तक सहला रही कांग्रेस इस बार उस झटके को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश में है। कांग्रेस के दलबदलुओं के उसके पाले में लौटने से भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन गड़बड़ा गया है, खासकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में। चुनाव में यह कांग्रेस के लिए फायदे में बदल सकता है। दल-बदल ने प्रदेश कांग्रेस में शीर्ष स्तर से वजन कुछ कम किया, जिससे उसे अपने आंतरिक मामलों को बेहतर ढंग से संतुलित करने में मदद मिली। सभी नेता अब पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ की बात मानते हैं। पार्टी के चुनाव अभियान पर कमलनाथ ने पूरी मजबूती से पकड़ बना रखी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ ने राज्य में उत्साह पैदा किया था, और अब उनके पास एक अपना समर्थक-आधार है, जो पार्टी को एक अतिरिक्त ताकत देता है। देशभर में जाति-आधारित सर्वे का वादा करके, कांग्रेस के अस्वाभाविक रूप से जाति की राजनीति में कूदने की मध्य प्रदेश में आजमाइश होगी। राजस्थान और छत्तीसगढ़ के उलट, मध्य प्रदेश में कांग्रेस के पास ज्यादा संख्या में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के नेता नहीं हैं। पार्टी को आम आदमी पार्टी (आप) के सटीक निशाने वाले हमलों का सामना भी करना पड़ सकता है। ‘आप’ मुकाबले की द्विध्रुवीय प्रकृति को बदलने की कोशिश कर सकती है। कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती हिंदू अस्मिता की राजनीति के सवाल पर फूंक-फूंक कर कदम रखना है, और उस सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचना है जिसका सहारा भाजपा बैकफुट पर होने की स्थिति में फितरतन लेती है।

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